First time in Banaras


12/05/2012

बात उस समय की है जब मैं १२वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके बीए में प्रवेश लेने के लिए बनारस गया हुआ था | पिताजी भी साथ थे | हालाँकि मुझे पिताजी का आना पसंद नहीं था लेकिन उनकी बात को टालना उनके दिल को दुःख पहुँचाना था इसलिए मैंने उन्हें बनारस आने के लिए कहा | उनकी जिद्द थी कि हम उनकी जान पहचान वाले गन्ना विकास संस्थान में रुक जायेंगे | यह गन्ना संस्थान बनारस शहर से दूर था और छोटे से कस्बे के चौराहे पर स्थित था | गर्मी के दिन थे और वो भी बनारस में | पारा ४५-४६ डिग्री छु जाता था, हालाँकि बारिश का मौसम शुरू हो चुका था | हमें प्रवेश लेने के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जाना था और इस प्रक्रिया में कम से कम २-३ दिन लगते थे |
शाम का समय था | गन्ना संस्थान पहुचाते ही ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे मैं किसी अनजानी जगह पर पहुँच गया हूँ | साथ ही यह जगह कुछ ऐसी थी जिससे पता नहीं क्यों मेरा मन वहां से जल्दी से जल्दी कहीं और जाने का हो रहा था | एक हरियाली रहित और धूल-धूसरित चौराहे पर स्थित इस संस्थान में बहुत कम लोग ही दिख रहे थे | शुरुआत में तो हमें पहचाना नहीं गया क्योंकि मुख्या अधिकारी जो पिताजी को जानते थे उस कैम्पस में नहीं रहते थे | हालाँकि लंद्लिने फ़ोन जो कि काफी जर्जर हालत में दिख रहा था उससे एक कॉल करने के बाद हमें यह बताया गया कि कमरा आपको जल्द ही मिल जायगा | हमें एक कमरा दे दिया गया जिसमे एक कूलर और बढ़िया गद्दे वाले बेड पड़े हुए थे | पिताजी ने गर्व से मुझे बोला "देखो ! कितने अच्छे कमरे हैं |" मुझे ज्यादा कुछ अच्छा नहीं लग रहा था और मुझे भूख भी लगी हुई थी | घर से लाया हुआ भोजन हमने किया पर पता नहीं क्यों मेरा मन कही और ही था | मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था | मुझे बहुत जोर कि प्यास लगी हुई थी और जग का पानी एक दम खुलता हुआ | मुझे फिर लगा कि पिताजी मुझे किस जगह पर लेकर आये हैं | हालाँकि पिताजी ने एक नौकर से ठन्डे पानी के लिए बोला पर जो पानी वह लाया वो भी बहुत ठंडा नहीं था जैसा मैं चाहता था | मैंने पिताजी से बोला कि बहार चल कर थोड़ी बर्फ खरीद लेट हैं पर मेरा कहना व्यर्थ था | रात हो चली थी |
पिताजी थकावट के कारण निद्रा में जल्द ही लीं हो चुके थे पर पता नहीं मुझे क्यों नींद नहीं आ रही थी | उस समय के छोटे क्या बड़े कस्बो में भी रात में बिजली चली जाया करती थी | यहाँ भी बिजली जाना कुछ नया नहीं था मेरे लिए | अचानक रात में बिजली चली गयी और मच्छरों ने मेरे कान में अपने राग सुनाने शुरू किये और गर्मी तो थी ही | पसीने से तर बतर हो रहा था मैं और परेशान होकर पिताजी को बोला कि मैं छत पर जा रहा हूँ | पिताजी ने बोला कि वहां भी मच्छर काटेंगे, यही रहो थोड़ी देर में बिजली आ जाएगी | लेकिन मैं बचपन से मनमौजी था और हॉस्टल में रहकर किसी और कि न सुनना मेरे लिए आम बात थी | और दूसरी तारा[ह पिताजी भी मुझे कभी दुबारा नहीं बोलते थे क्योंकि वो जानते थे कि मैं अपने मन क़ी ही सुनता हूँ | वैसे भी यहाँ पर पिता और पुत्र के सम्बन्ध कभी भी वैसे नहीं रहे अक्सर हम देखते और सुनते हैं | मेरी बात पिताजी से बहुत कम होती थी और अभी ऐसा ही है | माँ को मैं अपने नजदीक पाता हूँ, पर उतना भी नहीं जितना आम तौर पर होता है | हाँ तो मैं कहाँ पर था - मैं छत पर जाना चाहता था | मैं छत पर चला गया, गर्मी से थोड़ी रहत मिली पर एक भी तिनका नहीं हिल रहा था और मेरा मन बेचैन ही था | कभी में उस तीन मंजिल आवास से दक्षिण क़ी तरफ रेलवे लाइन पर जाती हुई रेलगाड़ियों को देखता तो कभी फिर दीवाल का सहारा लेकर बैठ जाता और मच्छरों के आने पर अपने सर और पैर चादर से ढक लेता |
अचानक तभी बिजली से सारा क़स्बा रोशन हो गया और मैं सीढ़ी से नीचे वापस आ गया और कूलर क़ी ठंडी हवा में फिर सो गया | पिताजी जग कर फिर सो गए | सुबह हुयी हम नहीं धो कर तैयार हो गए बी एच यू जाने के लिए | वह से शाम को लौटने के बाद फिर हम "पड़ाव" स्थित गन्ना संस्थान में आ गए | मुझे बचपन से ही भोजन में जो पसंद आता है वही खाता हूँ | संस्थान के बहार कुछ दुकाने थी जो कि गन्ने का रस, भुने हुए अनाज, भोजन इत्यादि कि थी | हमने जिस लेने के बाद कुछ केले ख़रीदे और संस्थान कि तरफ चलने लगे परन्तु मेरा मन था कि कुछ नमकीन भी ले लिया जाये | मैंने पिताजी को थोडा डरते हुए बोला कि मुझे मूंगफली चाहिए | उन्होंने मना नहीं किया और मूंगफली के दाने खरीद कर मुझे दे दिए | मैं मन में थोडा सा अच्छा महसूस कर रहा था क्योंकि उन्होंने मना नहीं किया | आज क़ी रात बिजली नहीं गयी और हम एक सुकून बहरी नींद ले सके |