अपनी बेटियों को 'बहादुर' बनाओ ताकि उन्हें सुपरमैन कि जरुरत न पड़े बल्कि वे सुपरवूमन बने

जब तहलका ने अपनी मैगजीन (पत्रिका) निकालनी शुरू की, तब मैं बीएचयू से स्नातक कर रहा था. तरुण तेजपाल बड़ा नाम था, मैंने सोचा भाई बड़ा आदमी है तो सोच भी बड़ी होगी। महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने की बड़ी बड़ी बातें करते थे भाई साहब ! और हाँ अंग्रेजी भी सीखनी थी तो बस इसी चक्कर में तहलका के अंक मेरी टेबल पर नज़र आने लगे. कच्ची उम्र में हम बड़ी जल्दी ही लोगो पर विश्वास कर लेते हैं. मैंने भी इनके स्टिंग देखकर इनके चारित्रिक महानता का ख्याली पुलाव अपने मन में पका लिया था. मैं पहले अक्सर लोगो के पद और प्रसिद्धि को देखकर उनके चरित्र के बारे में एक अपने मन में एक तस्वीर बना लेता था. पर अब नहीं। अब मैं, चाहे ही जितना बड़ा आदमी हो, उसके चरित्र के बारे में कोई तस्वीर (कम से कम सकारात्मक तो नहीं ही) नहीं बनाता क्योंकि पता नहीं उस आदमी के दिमाग में क्या हो, कब किसी अपनी बेटी, बहन, भाई, बेटे जैसी/जैसे के साथ घनौने कृत्य कर बैठे, कब उसकी ठरकी नज़रें शरीर के खुले (और ढके भी) अंगो और त्वचा पर अटक जाएं। २६ साल की उम्र में ही बहुतों को देख डाला है, अभी और लोगो को देखना बाकी है परन्तु मुझे निष्कर्ष अभी ही मिल चूका है - कभी किसी के बड़े पद पर होने से या महान कार्य चुकने के कारण उसकी सकारात्मक छवि अपने मन में मत बनाओ, नहीं तो जरुर खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है - आखिर हैं तो सब उसी पुरुषप्रधान समाज के देन. इक्का दुक्का छोड़ सब की निगाह एक जैसी ही है, खास तौर पर 'पदों' पर बैठे लोगो की, चाहे सरकारी संस्था हो या प्राइवेट, सबका वही हाल है - संस्था में एक महिला या लड़की के घुसते ही अपने पशुत्व को जगा लेते है और फिर उसका वहाँ रहना मुहाल कर देते हैं. लड़की भी क्या करे, है तो इसी समाज की उत्पाद, चुपचाप सहती है क्योंकि उसे सिखाया गया है कि वो 'कमजोर' है और उसके सुपरमैन (रक्षा करने वाले) पति, भाई, बेटे और पिता हैं. तो बने रहो 'कमजोर', कमजोर को सब सताते हैं, सुपरमैन भी घटना के बाद ही आता हैं. अरे, आज कल के बापू और मैया, अपनी बेटियों को 'बहादुर' बनाओ ताकि उन्हें सुपरमैन कि जरुरत न पड़े बल्कि वे सुपरवूमन बने जैसे नीचे दिए विडियो में लड़किया चाहती हैं.


http://www.youtube.com/watch?v=UFpe3Up9T_g&feature=share