ग्रामीण उत्तर भारत में जाड़े का मौसम

सूर्य महाराज के रूठने से पोर्ट्समथ में जाड़े ने अब लगभग दस्तक दे ही दी है... उत्तर भारत में भी रजाईयां, स्वेटर और मफलर बक्सों से निकलने लगे होंगे, जमीन पर पुआल के गद्दे बनने शुरू हो गए होंगे - केवल अपने सोने के लिए ही नहीं, बल्कि उन बेचारों (पालतू पशु) के लिए भी जिनकी भाषा हम नहीं समझ पाते। काली, गहरी रातें अब और भी लम्बी होती जा रही होंगी, सुबह में अब रास्ते की घास पर ओस की बूंदे जरुर दिखाई देने लगी होंगी, कुहरा भी दस्तक देने ही वाला होगा, हवाएं शांत और असमान साफ़ नजर आता होगा। जाड़े के स्वागत हेतु पेड़ अपनी पत्तिया गिरा रहे होंगे, कुत्ते-बिल्ली सब कहीं न कहीं गर्म कोने की तलाश में रहते होंगे, आग भी धीरे धीरे अब जीवनदायिनी बन रही होगी - हो सकता है किसी किसी के द्वारे पर सुबह शाम 'आगी' जलने भी लगी हो, हुक्का, चिलम और बीड़ी के सहारे चुनाव और खेती बाड़ी की चर्चा में घंटों गुज़र जाते हो। सब 'सुर्ज' महाराज की झलक पाने के लिए बेताब रहने लगे होंगे - स्नान के बाद धूप में खड़े रहते होंगे, नहा धोकर कभी छत पर और कभी आँगन में खाने का आसन लगाते होंगे, बिछौना बिछाते होंगे, लेकिन जब सब कुछ - पानी से लेकर रोटी तक - छत पर पहुँचाना पड़ता होगा और ठन्डे पानी से रात/सुबह में बर्तन धुलने पड़ते होंगे तो माँ कितनी परेशान हो जाती होगी। चाय की गर्म चुस्कियों का मज़ा भी तो अब बढ़ ही गया होगा, जाड़े जो आ रहे हैं