पूर्वोत्तर और नस्लभेद

अंग्रेजी टीवी चैनलों पर दिल्ली में पूर्वोत्तर भारत के एक छात्र को लेकर नस्लभेद पर चलने वाली बहस में कुछ भी सकारत्मक नहीं दीखता - सतही बहस जिसमे बड़े बड़े "विद्वान" भी बड़े अजीब अजीब तर्क देते है और कुछ लोग मुद्दा ऐसे उठाते है जैसे केवल नस्लभेद का शिकार केवल पूर्वोत्तर की जनसँख्या होती है। कुछ महानुभावों के लिए ये एक क्षेत्र या संस्कृति का मुद्दा भर है। क्या उत्तर भारतीयों का मुम्बई को इसका सामना नहीं करना पड़ता? क्या बिहार उत्तर प्रदेश के मजदूरों को पूर्वोत्तर में ये सहना नहीं पड़ता? क्या दक्षिण भारत के लोगो को उत्तर भारत में ये सहन नहीं करना पड़ता है? - हम सब जो भी अपने राज्य से बाहर गए हैं, इसका शिकार हुए हैं, लेकिन मीडिया का बुद्धिजीवी वर्ग इसे नस्लभेद के तौर पर नहीं देखता। कुछ भी हो, लेकिन ये बात तो तय है कि भारतीय नस्लभेद में दुनिया के अन्य लोगो से कहीं कम नहीं है। आज लोगो से पूछो तो उनके लिए उनका धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र पहले आता है, बहुत से लोग तो देश का नाम भी नहीं जानते। आज भी उनके लिए उनका देश उनकी जाति है, धर्म है, १००-२०० किलोमीटर का क्षेत्र है। मुझे लगता है हम आधुनिक भारत नामक 'राष्ट्र' को स्थापित करने में असफल होते जा रहे हैं। हमारे पास कोई भी ऐसा औजार नहीं है जिससे हम सारे भारतीयों के भीतर 'राष्ट्र' की भावना 'धर्म, जाति और क्षेत्र' की भावना से जयादा मजबूत बना सके। मसलन, हमारे नेशनल टीवी, नेशनल रेडियो में कुछ भी ऐसा नहीं रह गया है जो पूरे देश को जोड़ता हो। पूर्वोत्तर में रेडियो पर चीन के चैनेल इतनी स्पष्ट बजते है कि पूछिए नहीं। आपका मन करेगा कि आल इंडिया रेडियो बंद करे और चाइनीस ही सुने। ब्रिटेन में लोग बीबीसी देखते हैं - बीबीसी सबसे बड़ा मीडिया है और लोग उसे देखते हैं -बीबीसी के ही बीसियों टीवी और रेडियो चैनल हैं और लोग के बीच वो बेहद प्रचिलित है क्योंकि वो सबसे अच्छे प्रोग्राम्स बनाते हैं और दिखाते हैं। हमारे यहाँ क्या प्रचिलित है - प्राइवेट चैनल - कलर्स, स्टार टीवी, ज़ी टीवी, ये टीवी, वो टीवी -- हमने तो कभी नहीं देखा कि हमारा दूरदर्शन का कोई चैनल हमारे दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर भारत के नैसर्गिक सौंदर्य या सांस्कृतिक विरासत पर कोई बढ़िया सी डॉक्युमेंट्री बनाकर प्रसारित की हो या फिर कुछ ऐसा जो राष्ट्र के लोगो के बीच संवाद स्थापित करने में मदद करे। हम जब तक एक "राष्ट्र" निर्माण नहीं करेंगे, जब लोग जानेंगे नहीं कि देश के कौन से भाग में कौन रहता है, कैसी भाषा बोली जाती है, कैसा रहन सहन है - जब तक लोगो के मन की जाति, धर्म, और क्षेत्र की बंद खिड़किया खोली नहीं जाती - हम ऐसे 'बिहारी', 'भैया' 'मद्रासी' 'चिंकी' 'कटुआ' 'चमार' 'पहाड़ी' 'नेपाली' जैसे शब्दो की मार झेलते रहेंगे। हम अपने आजादी के नेताओ के 'भारत राष्ट्र' निर्माण के सपनो को पूरी तरह भूल चुके हैं और यह समझते हैं कि 'भारत' तो बस सिर्फ एक 'राजनीतिक समझौते से उत्पन्न संघ' भर है और कैसे भी इसे धीरे चलाना है और अंत में इसे टूटना ही हैं। भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता से 'राष्ट्र' निर्माण करना इतना आसान नहीं है पर असम्भव भी नहीं है। जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र जब तक गौड़ नहीं होंगे और 'भारत' की भावना सर्वोपरि नहीं होगी, तब तक देश में 'चिंकी' सुनाई देता रहेगा - पुलिस और सरकार कुछ नहीं कर सकती है। दूसरी बात ये भी है कि हम भारतीय अक्सर 'दूसरी/दूसरे' भाषा, संस्कृति, ड्रेस, धर्म के प्रति हमेशा एक द्वेष की भावना से पीड़ित रहते हैं उस राज्य और संस्कृति के लोगों के बीच रह कर घुलने मिलने की कोशिश नहीं करते - अपना 'ग्रुप' बना कर रहने में बड़ा विश्वास रखते हैं - तो बनाओ खूब ग्रुप - दुनिया में हर देश में लोकल लोग 'ग्रुप' बनाकर रहने वालों बाहरी लोगों को जबर्दस्त 'प्रसाद' देते हैं ये जान लो। जो व्यक्ति घुल मिल जाते हैं, लोकल लोगो में अपने दोस्त बना लेते हैं, लोकल संस्कृति में घुल मिल जाते हैं, उनके तौर तरीके सीखते हैं, उनसे रोज मिलते जुलते हैं, उनका कभी कुछ नहीं बिगड़ता। ब्रिटेन भी कुछ भारत जैसा ही है - यहाँ भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, मध्य पूर्व के शरणाथी, चाइनीस सब हैं पर खबरों में भारतीय गलत वजहों से बहुत कम ही नज़र आते हैं - क्यों? इसीलिए क्योंकि हम यहाँ के कल्चर में ढल जाते हैं जबकि बाकी नहीं ढल पाते - वे अपने बच्चो को धार्मिक स्कूल में भेजते हैं, बीवी को बुरका पहनाते हैं और अपने धर्म और देश के लोगो के बीच में जयादा वक़्त बिताते हैं और ब्रिटेन जिसने उनको शरण दी, काम-धंधा करने की छूट दी, उसको और उसके लोगों को गाली देते हैं, बुराई करते हैं, और अपने धार्मिक नियमों को ब्रिटिश लोगों पर थोपने के कोशिश करते हैं। इसीलिए आम जनता ऐसे लोगो का प्रतिरोध करती है - इसीलिए कहते हैं - जैसा देश वैसा भेष - अंग्रेजी में कहें तो - इन रोम, डू ऐस रोमन्स डू।