Betanica Inn - Gramado, Brazil


काफी दिन पहले एक बंगाली फ़िल्म देखी थी - उस फ़िल्म को दार्जिलिंग और कुएर्सांग नामक छोटे पहाड़ी कस्बों में फिल्माया गया था - आज से पचास साठ साल पहले का दार्जिलिंग और उसके  आस पास के इलाके तब इतनी भीड़ भाड़ वाले नहीं थे - हरे भरे पहाड़ , बादल, हल्की फुहारें, शान्ति और भीड़ भाड़ से दूर --- कुछ ऐसा ही है यह क़स्बा - खास तौर यहाँ के होटल बेहद खूबसूरत हैं – कम से कम जिनमे मैं रुक रहा हूँ - इंग्लैड भी फीका है इसके सामने - मैंने जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा सुन्दर और शांत है - अभी शाम होने को आयी है - सूरज ढल चुका है - बस कुछ उजाला बाकी है - चिड़ियाँ चहचहा रही है और मैं होटल की पहली बालकनी में बैठकर आनंद ले रहा हूँ – चारों तरफ बस हरियाली ही नज़र आ रही है – लकड़ी की रेलिंग से नीचे देखने पर बस हरा रंग दिखाई पड़ता है – लॉन में बस हरी घास है – पेड़ों के तनों के नीचे कई जगह रंग बिरंगे फूलों से भरे छोटे छोटे गमले है – एक जगह पुरानी लकड़ी पड़ी हुई है और उसके सहारे लकड़ी की तख्ती का रंग बिरंगा बड़े साइज़ का हँसता मुस्काता हुआ “बीटल” ऐसे रखा हुआ है कि लगे वो लकड़ी पर चढ़ रहा है और उस तख्ती पर नीचे पोर्तुगीस भाषा में लिखा हुआ है ‘Bem Vindo’ – यानी ‘आपका स्वागत है’ – उसे देखते ही मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी - एक झाड़ में सफ़ेद और गुलाबी रंग के बेहद घने फूल खिले हुए है – पत्ते दिखाई तक नहीं पड़ते – ऐसा लगता है ये होटल अभी नया ही बना है – एक झूला भी पड़ा हुआ है – एक बेंच – सब के सब खाली – क्योंकि यहाँ पर लोग सुकून ढूँढने आते है और ज्यादातर समय रेस्तरां या घूमने में बिताते है – फिलहाल अगर अच्छी धूप हो, तो शायद लोग होटल के इस लॉन में जरुर बैठते होंगे – अब रात हो चली है – बालकनी की बत्तियां जल उठी है – बादल भी आ रहे है