फर्क देखिये

फर्क देखिये - बचपन में यदि कॉपी/नोटबुक जमीन पर गिर जाती थी या पाँव के नीचे आ जाती थी या किताब/नोटबुक का पन्ना फट जाता था तो विद्या की देवी का अपमान समझ हम उसके पैर छू लेते थे, अपने भीतर ग्लानि महसूस होती थी। क्योंकि हम उसकी इज्जत करते थे, उसके महत्व को समझते थे, उसे प्यार करते थे। लेकिन अब जैसे जैसे उम्र बढ़ती जा रही है, कागज सिर्फ "कागज" बन के रह गया है, सैकड़ों पन्ने रोज कूड़ेदान में चले जाते है, किताबे जमीन पर पड़ी रहती हैं - पर न सरस्वती का अपमान होता है और न ही ग्लानि महसूस होती है। यह उदासीनता मुझे खलती है - जाने कहाँ से जिंदगी में घुस गयी? मैं खुद ही नहीं जानता। कागज़ को सरस्वती रूप समझ उसे सम्भालकर रखने का जो संस्कार दादा-दादी और माँ-बाप से मिला था - आज कहीं गायब सा हो गया है।