स्वघोषित बुद्धिजीवी और सेक्युलर वर्ग

हमारे देश के 'स्वघोषित बुद्धिजीवी और सेक्युलर वर्ग' को बहुसंख्यक त्यौहारों से इतनी घृणा क्यों है? उन्हें होली में पानी बर्बाद होते दीखता है, दिवाली में वायु प्रदूषण होते दीखता है, रक्षाबंधन महिलाओं को कमजोर बनाने की कोशिश दिखती है, करवा चौथ का व्रत उन्हें महिला अधिकारों पर आघात लगता है, दुर्गा पूजा और गणेश चतुर्थी पर मूर्तियों के विसर्जन से प्रदूषण होता दीखता है, विश्वकर्मा पूजा पर हिंसक हथियारों की पूजा ही दिखती है, महिषासुर में उन्हें भगवान दीखता है, गणेश उत्सव का उत्तर भारत में प्रसार होने से उन्हें मिर्ची लगती है, करवा चौथ उन्हें फिल्मों की देन लगती हैं। पर वहीँ दूसरी तरफ गुड फ्राइडे, क्रिसमस, हेलोवीन, बकरीद इत्यादि पर उनकी आँखों पर पट्टी बंध जाती है जैसे उन त्योहारों में तो कुछ बुराइयां हैं ही नहीं। उन्हें मंदिरों में दी जाने वाली बलि से समस्या है पर जीभ के स्वाद के लिए अपने और अल्पसंख्यकों के द्वारा मुर्गे, बकरे, भैंसे को काटकर खाने में नहीं। अगर तुम कह दो कि हम शाकाहारी हैं तो ये सेक्युलर बुद्धिजीवी आपसे तुरंत पूछेगा - आप सवर्ण हैं? पंडित हैं? जवाब 'न' मिलने पर फिर चिढ कर सवाल करेगा - 'तब क्यों नहीं खाते हैं?' अरे मूर्ख !!! मैं नहीं खाता हूँ, मेरी मर्जी - मांस खाने और न खाने के लिए क्या किसी जाति विशेष में पैदा होना जरुरी है। हिंदुस्तान में "बुद्धिजीवी" होने का दिखावा करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते - अपने माँ-बाप को भी गाली देना पड़े तो देंगे। इन बुद्धिजीवियों में 'यूनिवर्सिटी' से 'पढ़े-लिखे' लोगों की तादाद बहुत हैं। मुझे तो सहन नहीं होते ऐसे दोमुहे ढोंगी प्रवृत्ति के लोग। अगर किसी चीज का मूल्यांकन करना ही है तो 'संतुलित' होकर प्रामाणिक तथ्यों के साथ अपनी बात रखे - हर चीज के दो पहलू होते हैं।