जब कोई सलाह मांगे, सलाह दीजिये, भूल जाइए और खुश रहिये।

एक कहावत है सुनो सब की, करो मन की। कहावत तो अपने देश की ही है पर इस कहावत को हम अक्सर अपनी जिंदगी में इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं, उतार नहीं पाते है। क्यों? क्योंकि अगर आप अपने मन की करने लगते हैं तो आपसे उम्र में बड़े लोग जिनसे आपने सलाह ली है वो नाराज़ हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि आप उनकी अवमानना कर रहे हैं, उनका अनादर कर रहे हैं। वो इस बात से परेशान रहते हैं कि आपने उनकी सलाह/बात नहीं मानी। उन्हें लगता हैं कि वो बड़े है इसलिए उनकी सलाह आपको माननी ही चाहिए। बजाय ये समझने के कि आप उनकी सलाह पर अमल क्यों नहीं किया, ज्यादातर लोग आप के सलाह न मानने को अपनी बेइज्जती/इंसल्ट के तौर पर ले लेते हैं। वो मुंह फुलाकर बैठ जाते हैं, आपसे बात नहीं करते हैं।
मुझे लगता है कि अगर किसी ने सलाह मांगी चाहे वह छोटा हो बड़ा, आपका काम है सलाह देना, न कि ये आशा रखना कि आपकी सलाह ही उसके लिए सर्वश्रेष्ठ है और उसे उस पर अमल करना ही चाहिए। हमेशा याद रखिए कि किसी व्यस्क को बिना मांगे सलाह देने की आदत अच्छी नहीं होती है। अक्सर आप सलाह बिना मांगे सलाह देते हैं क्योंकि आपको लगता है आप उसके शुभ चिंतक है, पर जरुरी नहीं जिसे आप अपनी सलाह दे रहे हैं वो भी सोचता हो कि आपके उसके शुभ चिंतक हैं। आपको लगने से कुछ नहीं होता है। अगर सलाह देनी है तो उस व्यक्ति के साथ अपना कम्युनिकेशन मज़बूत करें और उसके विश्वस्त बनें।
अगर कभी आप अपने मित्रों, भाइयों, बहनों, बेटे, बेटियों को भी बिना सलाह बिना मांगे देते हैं तो भी आपका का कोई अधिकार नहीं बनता कि आप उस व्यक्ति पर ये दबाव डालें कि वो आपकी सलाह माने ही या ये आशा रखें कि वो आपकी सलाह मानेगा ही। हर व्यस्क व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। उसको आप मुताबिक नहीं चला सकते हैं। सलाह देनी है दे दीजिए फिर आप काम में जुट जाइये। वो सलाह माने या माने, उसकी मर्जी। अगर आपकी सलाह नहीं मानी जाती है तो आपको दुखी नहीं होना चाहिए। क्यों दूसरों के एक्शन्स को लेकर अपनी जिंदगी के दुःख बढ़ाने? क्या आपकी अपनी जिन्दगी के दुःख जूझने के लिए कम हैं? आपको उस व्यक्ति पर नाराज़ भी नहीं होना चाहिए। उसकी अपनी स्वतंत्रता है। आपको बेइज्जत भी नहीं महसूस करना चाहिए।
बस जब कोई सलाह मांगे, सलाह दीजिये, भूल जाइए और खुश रहिये।