पेटा (PETA) इंडिया का दोगलापन

पेटा दुनिया भर में जानवरों को एथिकल ट्रीटमेंट की बात करती है। जानवरों के क़त्ल को रोकने के लिए काम करती है। हर जगह आवाज बुलंद करती है सिवाय कुछ जगहों पर छोड़ कर।  वो कौन से ऐसे मौके हैं जब पेटा जानवरों के मुद्दे पर शांत रहना पसंद करती है? पेटा कभी भी इस्लाम या इस्लामिक देशों में हो रहे जानवरों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। इस्लाम में कई ऐसे त्यौहार हैं जब लाखों करोड़ों की तादाद में जानवर काटे जाते हैं पर पेटा के ऑफिस से कोई अपील नहीं आती जो इस खून खराबे को बंद करने के लिए अपील करे। दूसरी तरफ जहाँ पर पेटा को लगता है कि विरोधी शांतप्रिय है और उनके खिलाफ अभियान चलाने में उसका और उसके वालंटियर्स का कुछ नहीं बिगड़ेगा, वो पूरे तामझाम के साथ प्रोट्रस्ट करने लग जाते हैं। ऐसा ही कुछ भारत में हुआ। दक्षिण भारतीय हिंदुओं की सांस्कृतिक धरोहर बुल रेसिंग पर पेटा ने अपना अभियान शुरू किया और बात को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए और जल्लीकट्टू पर कानूनी रोक लगवा दी। पर पेटा की ये हिम्मत नहीं है कि बकरीद जो कि मुसलमानों का त्यौहार है के दौरान करोड़ों जानवरों के क़त्ल पर कोर्ट जाकर पर रोक लगवा दें। क्योंकि पेटा को मालूम है मुस्लमान न केवल उनके वालंटियर्स को जान से मार देंगे बल्कि पेटा को अपना ऑफिस बंद कर अपने देश लौटना पडेगा।
अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार आने के बाद गैर कानूनी स्लॉटर हाउसेस को सरकार ने बंद करवा दिया, पर अभी तक पेटा की इस  पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है - न ख़ुशी की, न दुःख की। कारण जानते हैं? क्योंकि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री हिन्दू है और बीजेपी हिंदुओं की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टी है। पेटा इंडिया में बैठे लोग सिर्फ हिंदुओं से नफरत करते है, परंतु इस्लाम के खिलाफ बोलने में उनको डर लगता है। नेपाल में हिंदुओं के पर्वो के दौरान पशुओं के क़त्ल को तो पेटा अंतर्राष्ट्रीय स्तर जोर शोर से उठाती है, पर बकरीद पर होते खून खराबे पर ये चुप रहते हैं। पेटा की इसी हिपोक्रिसी की वजह से मैं अब इस संस्था को बिलकुल पसंद नहीं करता।