मुल्लों की यूनिवर्सिटी

जामिया में समाजशास्त्र की एक असिस्टेंट प्रोफेसर मिल गई। बात चलने लगी रिसर्च की। बात रोहिंग्या मुसलमानों तक पहुंची। कहने लगी भारत उनका होमलैंड है, उनको पनाह मिलनी चाहिए। हमने कहा ये वहां से हजारों किलोमीटर चल बॉर्डर पार कर जम्मू तक आ गए हैं तो थोड़ा और चलते तो उन्हें इस्लामिक गणराज्य मिल जाते। वहां आराम से रहते। ईरान, पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान जाकर भी तो पनाह ले सकते हैं, या फिर सिंगपुर चले जाए? क्या समस्या है वहां जाने में। रोहिंग्या और सीरियाई मुल्लों में कोई फर्क नहीं है। दोनों वहीं जा रहे हैं जहां सरकारें दयालु है और समाज सहनशील हैं। सीरियाई यूरोप और रोहिंग्या भारत। रोहिंग्या को पनाह देनी है या नहीं, ये भारत सरकार तय करेगी, मानवाधिकार संगठन नहीं। उनको रखने का खर्चा भारत सरकार की जेब से जाएगा, न कि विदेशी पैसे पर पल रहे मानवाधिकार संगठनों के खातों से। भारत कोई धर्मशाला नहीं है। तो कहने लगी कहने लगी ये तो संघी विचारधारा है। मैंने कुछ नहीं कहा, हंसता रहा। कहने लगीं हम तमिल बर्मीस है, भारत हमारी होमलैंड है, हमारे दादे परदादे को भारत सरकार को नागरिकता देनी पड़ी। तो मैंने कहा पहली बात तो रोहिंग्या भारतीय नहीं है। दूसरी बात अगर मान लो हैं भी, तो क्या आप होमलैंड वाला फॉर्मूला यहूदियों पर नहीं लगाएंगी। कहने लगी वो दूसरा मुद्दा है, इस्राएल यहूदी होमलैंड नहीं है, उन्होंने जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है। फिर मैं मुस्कुराता रहा उनके दोगलेपन पर। जैसे ही संघी शब्द इस्तेमाल किया में समझ गया कि मैं किससे बात कर रहा हूं। फिर बात किसी और मुद्दे की तरफ चली गई। बाद में पता चला, किसी मुल्ले से शादी की थी, अब तलाकशुदा हैं, लड़कों को यूनियनबाजी करने के लिए भड़काती हैं, so-called एक्शन रिसर्च करवाती हैं, सबको हेल्लो नमस्ते की जगह सलाम कहती है (जो कि मुझे बड़ा अजीब लगा, जामिया में हिन्दू भी सलाम करते हैं।), रोहिंग्या मुल्लों के लिए बड़ा प्यार है।