मेट्रो ट्रेन

मेट्रो में एक दिन मैंने एक बूढ़े कपल को अपनी सीट दे दी, पर उनसे एक धन्यवाद, थैंक यू, या एक मुस्कुराहट तक न निकली। जबकि देखने से दोनों पढ़े लिखे लग रहे थे। अरे भाई, नहीं धन्यवाद कहना चाहते हो, लेकिन मुस्कुराने में कौन सा तिजोरी लुट रही है। पहले मैं महिलाओं को भी अपनी सीट दे देता था पर जब देखा उन्हें भी उसका शुक्रिया अदा करना नहीं आता, तब से बंद कर दिया। अब से बूढ़ों को भी सीट देना बंद करने की सोच रहा हूं, लेकिन मुझे मालूम है दिल नहीं मानेगा। नहीं भी थैंक यूं बोलेगा, मुस्कुराएगा तब भी खुद से उठ जाऊंगा। लेकिन गुस्सा तो आता है, लोगों के कृतघ्नता भरे व्यवहार से व्यथित होकर अब पब्लिक प्लेसेस में किसी हिन्दुस्तानी की सहायता करने का मन नहीं करता है।